(....भाग १ से चालु) इन प्रश्नोंके उत्तर खोजने के लिए "स्मृति" की सांस्कृितक औरअाध्यात्मिक भूमिका के बारेमें सोचना अावश्यक है, क्योंकि विज्ञान, वाणिज्यऔर प्रचलित धर्म - इनसभी ने यह काम बडी चतुराई से सामान्य मानव के कंधों पर डालदिया है ।
अंतःकरणमें स्मृति का स्थानः
भारतीय दर्शन और संस्कृति मे स्मृति का स्थान विशेष है ।
स्मृति का स्थान समजने के लिए अंतर्विश्व और बहिर्विश्व के विविध अंगों को समज लेना चाहिए ।
गांधीजी के सिद्धांत और उनकी व्यवहार्यता बहुधा चर्चास्पद रहे हैं, किंतु उनका जीवन प्रामाणिक इन्सान को निश्चित ही प्रेरणादायी लगा है । कभी कभी तो जीवन से भी उनकी मृत्यु ज़ादा प्रभावी लगती है ! किसी भी प्रकार की पूर्वसूचना दिये बगैर इतना सहसा मृत्यु अा मिला, फिर भी संपूर्ण सज्ज; मुख से निकला "हे राम" ! ये कोई अकस्मात वाचक शब्द नहीं थे, बल्कि उपासना वाचक शब्द थे; अंतिम क्षण में उन्हें "ईश्वर" का स्मरण हुअा और येशु की तरह क्षमा धर्म का । राष्ट्र के एवं अन्य कई सेवा-कार्यों में अात्यंतिक व्यस्त होने के बावजुद उन किसी बातों का नहीं, बल्कि ईश्वर का स्मरण होना यह कोई सामान्य घटना नहीं है । "अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्" (८/५) इस गीता वचन की पुष्टी ही यहाँ दिखाई पडती है ।
अर्थात् मृत्यु के प्रति ऐसे प्रतिभाव का कारण था; अाजीवन की हुई "स्मृति" की अाराधना ।
भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण परिणाम है - उच्च चारित्र्य का निर्माण । नचिकेता, राजा जनक, महर्षि वेदव्यास, श्रीमद् आद्य शंकराचार्य, संत ज्ञानेश्वर, छत्रपति शिवाजी, लोकमान्य तिळक, स्वामी विवेकानन्द जैसे अनेक चरित्र इस भव्य संस्कृति की अमूल्य देन है । भारतीय इतिहास के हर काल व हर क्षेत्र में ऐसे उच्च चरित्र का होना हमारी संस्कृति की गरिमा तथा यशस्वीता का प्रतीक है ।
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