वैदिक काल में बालकों को शिक्षा की दीक्षा दी जाती थी । तप:स्वाध्याय निरत ऋषि, समाज में यज्ञ, एवं तपोवन में शिक्षण - ऐसे द्विविध रुप से सांस्कृतिक संवर्धन में व्यस्त रहते थे । जैसे एक भी ऋषि अविवाहित नहीं जान पडते, वैसे ही एक भी ऋषि तपोवन या अाश्रम से न जुडे हुए हो - ऐसा भी दिखायी नहीं पडता । समाज के धर्म और नीति-मूल्य रक्षण में व्यस्त ऋषि, राजा और शिक्षण - इन दोनों की ओर विशेष लक्ष्य दिया करते थे; क्यों कि यज्ञ की यथार्थता और समाज का नैतिक अारोग्य, राजा और शिक्षण - इन दोनों पर विशेष अवलंबित होता है । यज्ञ द्वारा समाज और शिक्षण द्वारा भावि व्यक्ति, विशेष रुप से पुष्ट होते थे । संस्कृति और अध्यात्म की अन्योन्यता चरितार्थ होती थी ।
“If I were asked under what sky the human mind has most fully developed some of its choicest gifts, has most deeply pondered on the greatest problems of life, and has found solutions to some of them which well deserve the attention even of those who have studied Plato and Kant, I should point to India.”
"जीवन" क्या है; वह कैसा होना चाहिए; मनुष्य जीवन में कुछ विशेषता होनी चाहिए या नहीं; क्या जीवन को आकार दिया जा सकता है; जन्मगत प्रकृति और संस्कारों को उन्नत किया जा सकता है, इत्यादि विषय सदैव महत्त्वपूर्ण रहे हैं और उस चिंतन के प्रतिध्वनि स्वरुप "शिक्षण" एवं “शिक्षाप्रणालि” वैश्विक सभ्यताओं में आकार लेते रहे हैं ।
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