उपकारगृहीतेन शत्रुणा मुद्रण
उपकारगृहीतेन शत्रुणा शत्रुमुध्दरेत् ।
पादलग्नं करस्थेन कण्टकेनैव कण्टकम् ॥

उपकार से वश किये गये शत्रु द्वारा दूसरे शत्रुका नाश करना चाहिए । जैसे पैर में लगे कंटक को हाथमें लिए दुसरे काँटेसे निकाला जाता है ।