आत्मनश्र्च परेषां च यः मुद्रण ई-मेल
आत्मनश्र्च परेषां च यः समीक्ष्य बलाबलम् ।
अन्तरं नैव जानाति स तिरस्क्रियतेडरिभिः ॥

खुदके और दूसरेके बल का विचार करके जो योग्य अंतर नहीं रखता वह (राजा) शत्रु के तिरस्कार का पात्र बनता है ।

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