राजधर्म
पुत्र इव पितु र्गेहे विषये मुद्रण ई-मेल
पुत्र इव पितु र्गेहे विषये यस्य मानवाः ।
निर्भया विचरिष्यन्ति स राजा राजसत्तमः ॥

जिस राज्य के लोग, पुत्र जैसे पिता के घर पे निर्भय होता है, वैसे निर्भय होकर फिरते हैं, वह राजा श्रेष्ठ राजा है ।

 
शुचि र्भूमिगतं तोयं मुद्रण ई-मेल
शुचि र्भूमिगतं तोयं शुचि र्नारी पतिव्रता ।
शुचिः क्षेमकरो राजा सन्तोषी ब्राह्मणः शुचिः ॥

भूमि में रहा हुआ पानी, पतिव्रता नारी, कल्याणकारी राजा और संतोषी ब्राह्मण पवित्र है ।

 
सन्मित्राणां वर्धयते नृपाणां मुद्रण ई-मेल
सन्मित्राणां वर्धयते नृपाणां
लक्ष्मीः मही धर्म यशः समूहः ।
दुर्मन्त्रिणा नाशयते नृपाणां
लक्ष्मी मही धर्म यशः समूहः ॥

अच्छे मंत्री राजा की लक्ष्मी, भूमि, धर्म और यश बढाते हैं, जब कि बूरे मंत्री इन चारों का नाश करते हैं ।

 
सामदाने भेददण्डावित्युपाय मुद्रण ई-मेल
सामदाने भेददण्डावित्युपायचतुष्टयम् ।
हस्त्यश्व रथ पादातिं सेनाङ्गंस्यात् चतुष्टयम् ॥

राजा के पास साम, दाम, भेद और दंड ऐसे चार उपाय, और हाथी, घोडा, रथ और पायदल ऐसा चार अंग वाला सैन्य होना चाहिए ।

 
राजा बन्धुर बन्धूनां मुद्रण ई-मेल
राजा बन्धुर बन्धूनां राजा चक्षुरचक्षुषाम् ।
राजा पिता च माता च सर्वेषां न्यायवर्तिनाम् ॥

जिनका कोई संबंधी नहीं, राजा उसका संबंधी है; वह अँधों की आँखें हैं, और न्याय से चलनेवाले लोगों का माता-पिता है ।

 
प्रजां न रक्षयेद्यस्तु राजा मुद्रण ई-मेल
प्रजां न रक्षयेद्यस्तु राजा रक्षादिभि र्गुणैः ।
अजागल स्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थकम् ॥

जो राजा "रक्षण" इत्यादि गुणों से प्रजा का रक्षण नहीं करता, उसका जन्म बकरी के गले के स्तन की तरह निरर्थक है ।

 
नृपाणां नराणां च केवलं मुद्रण ई-मेल
नृपाणां नराणां च केवलं तुल्यमूर्तिता ।
आधिक्यं तु क्षमा धैर्यमाज्ञा दानं पराक्रमः ॥

राजा और सामान्य लोगों में एक तरह की समानता है । पर राजा में उनसे विशेष, क्षमा, धैर्य, आज्ञा, और पराक्रम होते हैं ।

 
राज्ञि धर्मिणि धर्मिष्ठाः मुद्रण ई-मेल
राज्ञि धर्मिणि धर्मिष्ठाः पापे पापाः समे समाः ।
लोकास्तमनुवर्तन्ते यथा राजा तथा प्रजाः ॥

राजा धार्मिक तो प्रजा धार्मिक, वह पापी हो तो प्रजा पापी, और वह समदृष्टि वाला हो तो प्रजा समदृष्टि वाली होती है । (प्रजा सदैव राजा का अनुकरण करती है) जैसा राजा वैसी प्रजा ।

 
सरस्वती स्थिता वक्त्रे मुद्रण ई-मेल
सरस्वती स्थिता वक्त्रे लक्ष्मी र्वेश्मनि ते स्थिता ।
कीर्तिश्च कुपिता राजन् तेन देशान्तरं गता ॥

हे राजन् ! सरस्वती तेरे मुख में है, लक्ष्मी तेरे घर में आ बसी है । इस लिए गुस्सा होकर कीर्ति दूसरे देश में चली गयी है ।

 
शस्यानि स्वयमत्ति चेद्वसुमती मुद्रण ई-मेल
शस्यानि स्वयमत्ति चेद्वसुमती माता सुतं हन्ति चेत्
वेलाम्बुनिधि र्विलङ्घयति चेत् भूमिं दहेत् पावकः ।
आकाशं जनमस्तके पतति चेदन्नं विषं चेद्भवेत्
अन्यायं कुरुते यदि क्षितिपतिः कस्तं निरोद्धुं क्षमः ॥

पृथ्वी स्वयं यदि धान खा जाय, माता बालक का वध करे, समंदर मर्यादा का उल्लंघन करे, अग्नि ज़मीन को जला दे, आकाश मस्तक पर आ गिरे, अन्न ज़हर बन जाय, और यदि राजा खुद अन्याय का आचरण करे, तो उन्हें रोकने कौन शक्तिमान है ?

 
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