राजधर्म
यथा देशस्तथा भाषा यथा मुद्रण ई-मेल
यथा देशस्तथा भाषा यथा राजा तथा प्रजाः ।
यथा भूमिस्तथा तोयं यथा बीजं तथाङ्कुरः ॥

जैसा देश वैसी बोली, जैसा राजा वैसी प्रजा, जैसी जमीन वैसा पानी, और जैसा बीज वैसा अंकुर होता है ।

 
छेदः चन्दन चूतचम्पकवने मुद्रण ई-मेल
छेदः चन्दन चूतचम्पकवने रक्षापि शाखोटके
हिंसाहंसमयूर कोकिल कुले काकेषु नित्यादरः ।
मातङ्गेन खरक्रयः समतुला कर्पूरकार्पसयोः
एषा यत्र विचारणा गुणिगणे देशाय तस्मै नमः ॥

जहाँ चन्दन, आम्रवृक्ष, चंपक वृक्षों का छेद होता है, और शाखोटक की रक्षा होती है; हंस, मयुर, कोकिल की हिंसा होती है, और कौए को मान मिलता है; हाथी के बदले गधा खरीदा जाता है; कपूर और कपास समान जोखे जाते हैं; गुणीजनों के प्रति इस प्रकार की विचारणा जहाँ की जाती हो, उस देश को नमस्कार !

 
अदण्ड्यान् दण्ड्यन् राजा मुद्रण ई-मेल
अदण्ड्यान् दण्ड्यन् राजा दण्ड्यांश्चैवाप्य दण्ड्यन् ।
अयशो महदाप्नोति नरकं चैव गच्छति ॥

दंड्य लोगों को दंड न देनेवाला, और अदंड्य को दंड देनेवाला राजा बदनाम होता है, और नर्क में जाता है ।

 
आज्ञा कीर्तिः पालनं सज्जनानां मुद्रण ई-मेल
आज्ञा कीर्तिः पालनं सज्जनानां
दानं भोगो मित्रसंरक्षणं च ।
येषामेतेषड्गुणाः न प्रवृत्ताः
कोऽर्थस्तेषां पार्थिवोपाश्रयेण ॥

आज्ञा, कीर्ति, सज्जनों का पालन, दान, भोग और मित्रसंरक्षण – ये छे गुन जिन में नहीं है, उन का (उस प्रजा का) राजा बनने का क्या मतलब ?

 
यथा बीजाङ्कुरः सूक्ष्मः मुद्रण ई-मेल
यथा बीजाङ्कुरः सूक्ष्मः प्रयत्नेनाभिरक्षितः ।
फलप्रदो भवेत् काले तद्वत् मन्त्राः सुरक्षिताः ॥

जैसे प्रयत्न से रक्षित सूक्ष्म बीजांकुर, समय आने पर फलदायी बनता है, वैसे हि सुरक्षित मंत्रीगण भी फलदायी बनता है ।

 
यथा मधु समादत्ते रक्षन् मुद्रण ई-मेल
यथा मधु समादत्ते रक्षन् पुष्पाणि षट्पदः ।
तद्वदर्थान् मनुष्येभ्यः आदद्यात् अविहिंसया ॥

जैसे भौंरे पुष्पों का रक्षण कर उस में से मध लेता है, वैसे राजा ने अहिंसा से प्रजा के पास से धन (कर) लेना चाहिए ।

 
कृपणानाथ वृद्धानां मुद्रण ई-मेल
कृपणानाथ वृद्धानां यदश्रु परिमार्जति ।
हर्षं सञ्जनयन् नृणां स राज्ञो धर्म उच्यते ॥

दीन, अनाथ और वृद्ध के आंसु पोछना और उनको आनंद देना, यह राजा का धर्म है ।

 
सदानुरक्तप्रकृतिः मुद्रण ई-मेल
सदानुरक्तप्रकृतिः प्रजापालनतत्परः ।
विनीतात्मा हिनृपतिः भूयसीं श्रियमश्नुते ॥

प्रजा पर हमेशा प्रेम रखनेवाला, प्रजापालन में तत्पर, विनीत राजा बहुत लक्ष्मी प्राप्त करता है ।

 
सर्वदेवमयस्यापि विशेषो मुद्रण ई-मेल
सर्वदेवमयस्यापि विशेषो भूपते रयम् ।
शुभाशुभ फलं सद्यः नृपाद्देवात् भवान्तरे ॥

राजा देवमय होने के बावजुद राजा में अनेक विशेषता है । शुभ और अशुभ फल राजा के पास से तुरंत मिलता है, देव के पास से तो मरने के बाद मिलता है ।

 
वाग्दण्डं प्रथमं कुर्यात् मुद्रण ई-मेल
वाग्दण्डं प्रथमं कुर्यात् धिग्दण्डं तदनन्तरम् ।
तृतीयं धनदण्डं तु वधदण्डमतः परम् ॥

राजा ने पहेला "वाग्दंड" करना, फिर "धिक् दंड", फिर "धन दंड" और अंत में वधदंड करना चाहिए ।

 
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