राजधर्म
अनागतविधाता च मुद्रण ई-मेल
अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिश्र्च यः ।
द्वावेव सुखमेधेते दीर्घसूत्री विनश्यति ॥

न आये हुए संकट की आगे से तैयारी रखनेवाला और प्रसंगावधानी ये दो (प्रकार के राजा) हि सुखी होते हैं । विलंबसे काम करनेवालेका नाश होता है ।

 
उत्तमं प्रणिपातेन शूरं मुद्रण ई-मेल
उत्तमं प्रणिपातेन शूरं भेदेन योजयेत् ।
नीचमल्पप्रदानेनेष्टं धर्मेण योजयेत् ॥

अपनेसे श्रेष्ठ हो उसको प्रणाम करके, शूर को भेदनीतिसे, कम दरज्जेवालेको कुछ देकर, और जिसकी जरुरत हो उसे न्याय पूर्वक अपना करना चाहिए ।

 
मूर्खे नियोज्यमाने तु मुद्रण ई-मेल
मूर्खे नियोज्यमाने तु त्रयो दोषाः महीपतेः ।
अयशश्र्चार्थनाशश्र्च नरके गमनं तथा ॥

मूर्ख मानवकी नियुक्ति करनेवाले राजाके तीन दोष अपयश, द्र्व्यनाश और नरकप्राप्ति ।

 
व्रजन्ति ते मूठधियः मुद्रण ई-मेल
व्रजन्ति ते मूठधियः पराभवम् ।
भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः ॥

जो राजा कपटी इन्सानके साथ कपटी वर्तन नहीं करता वह मूर्ख राजा का पराभव होता है ।

 
कुलीनः कुलसम्पन्नो मुद्रण ई-मेल
कुलीनः कुलसम्पन्नो वाग्मी दक्षः प्रियंवचः ।
यथोक्तवादी स्मृतिवान् दूतः स्यात् सप्तभि र्गुणैः ॥

कुलीनता, कुलसंपन्नता, वाक्चातुर्य, दक्षता, प्रियवादिता, उचित संदेशवहन और स्मृतिशक्ति - ये दूत के सात गुण हैं ।

 
दुष्टस्य दण्डः स्वजनस्य पूजा मुद्रण ई-मेल
दुष्टस्य दण्डः स्वजनस्य पूजा
न्यायेन कोशस्य हि वर्धनं च ।
अपक्षपातः निजराष्ट्ररक्षा
पञ्चैव धर्माः कथिताः नृपाणाम् ॥

दृष्ट को दंड देना, स्वजनों की पूजा करना, न्याय से कोश बढाना, पक्षपात न करना, और राष्ट्र की रक्षा करना - ये पाँच राजा के कर्तव्य है ।

 
श्रीमान् जनानिंद्यश्च मुद्रण ई-मेल
श्रीमान् जनानिंद्यश्च शूरश्चाप्यविकत्थनः ।
समदृष्टिः प्रभुश्चैव दुर्लभाः पुरुषस्त्रयः ॥

तीन तरह के लोग दुर्लभ है; जननिंदा को पात्र न हुआ श्रीमान, आत्मप्रशंसा न करनेवाला शूर, और सर्वत्र समदृष्टि रखनेवाला राजा ।

 
कालो वा कारणं राज्ञो मुद्रण ई-मेल
कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम् ।
इति ते संशयो माभूत् राजा कालस्य कारणम् ॥

काल (परिस्थिति) राजा का कारण है, या राजा काल का कारण है, इस संबंध में संशय मत रखो; राजा (हि) काल का कारण है ।

 
नियुक्त हस्तार्पित राज्यभाराः मुद्रण ई-मेल
नियुक्त हस्तार्पित राज्यभाराः
तिष्ठन्ति ते सौधविहारसाराः ।
बिडालवृन्दार्पित दुग्धपूराः
स्वपन्ति ते मूढधियः क्षितीन्द्राः ॥

नियुक्त किये हुए मंत्रीयों के हाथ में राज्यभार सौंपकर, जो महेल की अटारी में विहार करते रहते हैं, वे मूर्ख राजा मानो बिल्लों के समुह को दूध से भरा बर्तन सौंपकर सो गये हैं !

 
सर्वदा सर्वदोऽसीति मिथ्या मुद्रण ई-मेल
सर्वदा सर्वदोऽसीति मिथ्या त्वं स्तूयसे बुधैः ।
नारयो लेभिरे पृष्ठं न वक्षः परयोषितः ॥

(हे राजा,) तू हमेशा "सब देनेवाला है" ऐसी तेरी स्तुति बुद्धिमान लोग करते हैं, वह झूठ है । क्यों कि तू शत्रुओं को पीठ और परस्त्रीयों को छाती नहीं देता ।

 
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