राजधर्म
धूर्तः स्त्री वा शिशु र्यस्य मुद्रण ई-मेल
धूर्तः स्त्री वा शिशु र्यस्य मन्त्रिणः स्यु र्महीपतेः ।
अनीति पवनक्षिप्तः कार्याब्धौ स निमज्जति ॥

जिस राजाके सचिव की स्त्री या पुत्र धूर्त हो, उसकी कार्यरुप नौका अनीतिके पवन से डूब जाती है एसा समज ।

 
काचे मणिः मणौ काचो मुद्रण ई-मेल
काचे मणिः मणौ काचो येषां बिध्दिः प्रवर्तते ।
न तेषां संनिधौ भृत्यो नाममात्रोडपि तिष्ठति ॥

काच को मणि और मणि को काच समजनेवाले राजा के पास नौकर कभी नहीं टिकते ।

 
अपृष्टस्तु नरः किंचिद्यो मुद्रण ई-मेल
अपृष्टस्तु नरः किंचिद्यो ब्रूते राजसंसदि ।
न केवलमसंमानं लभते च विडम्बनम् ॥

राजसभा में बिना पूछे हि अपना अभिप्राय व्यक्त करनेवाले लोग केवल अपमानित हि नहीं पर उपहास के पात्र भी होते हैं ।

 
प्राज्ञे नियोज्यमाने तु मुद्रण ई-मेल
प्राज्ञे नियोज्यमाने तु सन्ति राज्ञः त्रयोगुणः ।
यशः स्वर्गनिवासश्र्च विपुलश्र्च धनागमः ॥

बुद्धिमान लोगों की नियुक्ति करनेवाले राजाको तीन चीज़ों की प्राप्ति होती है - यश, स्वर्ग और बहुत धन ।

 
नात्यन्तं सरलैर्भाव्यं पश्य मुद्रण ई-मेल
नात्यन्तं सरलैर्भाव्यं पश्य गत्वा वनस्थलीम् ।
छिद्यन्ते सरलास्तत्र कुब्जास्तिष्ठन्ति पंगुवत् ॥

दुनिया में अत्यंत सरल न होना । जंगलमें जाकर देखो, सरल वृक्ष (घर बनानेके लिए) काटा जाता है, लेकिन छोटे वृक्ष अपंग मानव की तरह अपनी जगह पर खडे रहते है (काटे नहीं जाते) ।

 
उपकारगृहीतेन शत्रुणा मुद्रण ई-मेल
उपकारगृहीतेन शत्रुणा शत्रुमुध्दरेत् ।
पादलग्नं करस्थेन कण्टकेनैव कण्टकम् ॥

उपकार से वश किये गये शत्रु द्वारा दूसरे शत्रुका नाश करना चाहिए । जैसे पैर में लगे कंटक को हाथमें लिए दुसरे काँटेसे निकाला जाता है ।

 
कौर्मं संकोचमास्थाय मुद्रण ई-मेल
कौर्मं संकोचमास्थाय प्रहारानपि मर्षयेत् ।
प्राप्ते काले च मतिमानुत्तिष्ठेत् कृष्णसर्पवत् ॥

कछुए की तरह अपने गात्र संकुचित करके प्रहारभी सहन करना, किन्तु बिध्दिमान मनुष्य ने समय आने पर साँप की तरह डर दिखाना चाहिए ।

 
सहसा विदधीत न क्रियाम् मुद्रण ई-मेल
सहसा विदधीत न क्रियाम्
अविवेकः परमापदां पदम् ।
वृणुते हि विमृश्यकारिणम्
गुण लुब्धाः स्वयमेव हि संपदः ॥

बिना सोचे कोई काम नहीं करना चाहिए, क्यों कि अविवेक यह आपत्तिका मूल है । गुण पर लब्ध होनेवाला वैभव खुद भी सोचकर मानवको पसंद करता है ।

 
आत्मनश्र्च परेषां च यः मुद्रण ई-मेल
आत्मनश्र्च परेषां च यः समीक्ष्य बलाबलम् ।
अन्तरं नैव जानाति स तिरस्क्रियतेडरिभिः ॥

खुदके और दूसरेके बल का विचार करके जो योग्य अंतर नहीं रखता वह (राजा) शत्रु के तिरस्कार का पात्र बनता है ।

 
मन्त्रबीजमिदं गुप्तं मुद्रण ई-मेल
मन्त्रबीजमिदं गुप्तं रक्षणीयं यथा तथा ।
मनागपि न भिद्येते तद्बिन्नं न प्ररोहति ॥

मंत्रका मूल गुप्त रखनेकी चेष्टा करनी चाहिए । क्योंकि जो मूल बाहर निकले तो बीज उगेगा नहीं (याने कि मंत्रणा विफल हो जायेगी) !

 
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