अविनीतः सुतो जातः मुद्रण ई-मेल
अविनीतः सुतो जातः कथं न दहनात्मकः ।
विनीतस्तु सुतो जातः कथं न पुरुषोत्तमः ॥

जैसे घेटे (अवि) पर बैठा हुआ (नीत) अग्नि है, वैसे अविनीत पुत्र को भी दाहक क्यों न कहना ? वैसे हि वि (गरुड) पर बैठा हुआ जैसे (नीत) पुरुषोत्तम है, तो विनीत पुत्र को पुरुषों में उत्तम क्यों न कहना ?

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