गृहस्थी
त्रयः कालकृताः पाशाः मुद्रण ई-मेल
त्रयः कालकृताः पाशाः शक्यन्ते न निवर्तितुम् ।
विवाहो जन्म मरणं यथा यत्र च येन च ॥

विवाह, जन्म, और मरण – ये कालांतरगत है, अनिवार्य है । ये जैसे, जहाँ, और जिसके साथ होने होते हैं, वैसे हि होते हैं ।

 
दर्शने स्पर्शने वाऽपि मुद्रण ई-मेल
दर्शने स्पर्शने वाऽपि श्रवणे भाषणेऽपि वा ।
यत्र द्रवयत्यन्तरङ्गः स स्नेह इति कथ्यते ॥

जिसके दर्शन से, स्पर्श से, भाषण के श्रवण से अंतरंग द्रवित हो जाता है, उसीको स्नेह कहते है ।

 
पुंनाम्नः नरकात् मुद्रण ई-मेल
पुंनाम्नः नरकात् त्रायते पितरं सुतः ।
तस्मात्पुत्र इति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयंभुवा ॥

'पुं' नामके नरक में से पिता को उबारता है, इस लिए पुत्र ऐसा स्वयं ब्रह्मा ने कहा है ।

 
सप्तैतानि न पूर्यन्ते मुद्रण ई-मेल
सप्तैतानि न पूर्यन्ते पूर्यमाणान्यनेकशः ।
ब्राह्मणोऽग्निर्यमो राजा पयोधिरुदरं गृहम् ॥

ब्राह्मण, अग्नि, यमराज, राजा, सागर, पेट और घर - ये सात, अनेक बार पूर्ण करने पर भी कभी पूर्ण नहीं होते ।

 
सदा वक्रः सदा क्रूरः मुद्रण ई-मेल
सदा वक्रः सदा क्रूरः सदा पूजामपेक्षते ।
कन्याराशिस्थितो नित्यं जामाता दशमो ग्रहः ॥

सदा वक्र, सदा क्रूर, सदा पूजा की अपेक्षा रखनेवाला, और नित्य 'कन्या' नाम की राशि पे रहेनेवाला 'जवाई' यह दसवाँ ग्रह है ।

 
अंबा तुष्यति न मया मुद्रण ई-मेल
अंबा तुष्यति न मया न स्नुषया
सापि नांबया न मया ।
अहमपि न तया न तया
वद राजन् कस्य दोषोऽयम् ॥

मेरी माँ न मुजसे संतुष्ट होती है, न बहुसे ! बहु (मेरी पत्नी) भी, न माँ से संतुष्ट होती है, न मुजसे; और मैं भी उन दोनों से संतुष्ट नहीं होता हूँ ! अर्थात् इस में किसका दोष है, यह बताओ ।

 
अध्यापनं ब्रह्मयज्ञ मुद्रण ई-मेल
अध्यापनं ब्रह्मयज्ञ पितृयज्ञस्तु तर्पणम् ।
झोमो देवो बलिर्भूतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम् ॥

पढना, पढाना, यह ब्रह्मयज्ञ है; पितरों का तर्पण (और) नित्यश्राद्ध, पितृयज्ञ है; होम करना देवयज्ञ है; प्राणी को देना, वैश्वदैव करना, भूतयज्ञ है; और अतिथिपूजन करना, मनुष्ययज्ञ है ।

 
पञ्च सूना गृहस्थस्य मुद्रण ई-मेल
पञ्च सूना गृहस्थस्य चुल्ली पेषष्युपस्करं ।
कण्डनी चोदकुम्भ बध्यते यस्तु बाह्यन ॥

चुल्हा, घंटी, झाडू, मुसल और पानी का घडा - ये पाँच गृहस्थ के घर में हिंसा के स्थान है । इनका उपयोग करके गृहस्थ पाप से बँध जाता है ।

 
निरुत्साहं निरानन्दं मुद्रण ई-मेल
निरुत्साहं निरानन्दं निर्वीर्यमरिनन्दनम् ।
मा स्म सीमन्तिनी काविज्जनयेत्पुत्रमीदृशम् ॥

निरुत्साही, निरानंदी, निर्वीर्य और शत्रु को जिसके जन्म से आनंद हो ऐसे पुत्र को तू कभी भी जन्म मत देना ।

 
अपि प्रसन्नेन महर्षिणां मुद्रण ई-मेल
अपि प्रसन्नेन महर्षिणां त्वं सम्यग्विनीयानुमतो गृहाय ।
कालो ह्ययं संक्रमितुं द्वितीयं सर्वोपाकारक्षममाश्रमं ते ॥

तुमसे प्रसन्न होकर क्या महर्षि वरतंतु ने तुम्हें अच्छी तरह शिक्षा देकर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के लिए अनुज्ञा दी है ? कारण सभी आश्रमों में उपकारक्षम तो गृहस्थाश्रम है, उस में प्रवेश करने का यही समय है । (रघुराजा की कौत्स को उक्ति)

 
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