गृहस्थी
एकेनापि सुपुत्रेण मुद्रण ई-मेल
एकेनापि सुपुत्रेण विद्यायुक्तेन भासते ।
कुलं पुरुषसिंहेन चन्द्रेणेव हि शर्वरी ॥

जैसे अकेले चंद्र से रात्रि शोभा देती है, वैसे विद्यावान और पुरुषों में सिंह जैसे एक सत्पुत्र से कुल शोभा देता है ।

 
स जातो येन जातेन मुद्रण ई-मेल
स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम् ।
परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते ॥

जिसके जन्म से वंश की उन्नति हो वही जन्मा कह सकते हैं; अन्यथा परिवर्तित होनेवाले इस संसार में मरनेवाला कौन सा इन्सान जन्मता नहीं ?

 
सुपुत्रो यः पितुर्मातुः मुद्रण ई-मेल
सुपुत्रो यः पितुर्मातुः भूरिभक्तिसुधारसैः ।
निर्वापयति सन्तापं शेषास्तु कृमिकीटकाः ॥

अत्यंत भक्तिरुपी सुधारस से जो माता-पिता का संताप दूर करता है वही सुपुत्र; बाकी के तो कृमि और कीटक (समान) हैं ।

 
पितृभिः ताडितः पुत्रः मुद्रण ई-मेल
पितृभिः ताडितः पुत्रः शिष्यस्तु गुरुशिक्षितः ।
धनाहतं सुवर्णं च जायते जनमण्डनम् ॥

पिता द्वारा मारा गया पुत्र, ग्रुरु द्वारा शिक्षा दिया गया शिष्य, और हथौडे से टीपा गया सोना लोगों में आभूषणरुप बनता है ।

 
शर्वरीदीपकश्चंन्द्रः मुद्रण ई-मेल
शर्वरीदीपकश्चंन्द्रः प्रभाते दीपको रविः ।
त्रैलोक्यदीपको धर्मः सत्पुत्रः कुलदीपकः ॥

रात्रि का दीपक चंद्र, प्रभात का दीपक सूर्य, त्रैलोक्य का दीपक धर्म, और कुल का दीपक सुपुत्र है ।

 
एकोऽपि गुणवान् पुत्रो मुद्रण ई-मेल
एकोऽपि गुणवान् पुत्रो निर्गुणैः किं शतेन तैः ।
एकश्चन्द्रः जगत् चक्षुः नक्षत्रैः किं प्रयोजनम् ॥

सौ गुणरहित पुत्रों के मुकाबले एक गुणवान पुत्र अच्छा । एक चंद्र जगत को प्रकाश देता है, तो नक्षत्रों का क्या काम ?

 
यं मातापितरौ क्लेशं मुद्रण ई-मेल
यं मातापितरौ क्लेशं सहेते सम्भवे नृणाम् ।
न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि ॥

मनुष्य के जन्म के बाद, माता-पिता उसके लिए जो क्लेश सहन करते हैं, उसका बदला सौ साल बाद चुकाना भी शक्य नहीं ।

 
श्रावयेद् मृदुलां वाणीं मुद्रण ई-मेल
श्रावयेद् मृदुलां वाणीं सर्वदा प्रियमाचरेत् ।
पित्रोराज्ञानुकारी स्यात् स पुत्रः कुलपावनः ॥

जो मृदु वाणी सुनकर सदा प्रिय आचरण करता है, माता-पिता की आज्ञा मानता है, वह पुत्र कुल को पावन करता है ।

 
आचारो विनम्रो विद्या मुद्रण ई-मेल
आचारो विनम्रो विद्या प्रतिष्ठा तीर्थदर्शनम् ।
निष्ठावृत्तिस्तपो ज्ञानं नवधा कुल लक्षणम् ॥

आचार, नम्रता, शास्त्रज्ञान, समाज प्रतिष्ठा, पवित्रता, श्रद्धा, व्यवसाय, व्रतपालन, और अनुभव ज्ञान – ये नौ कुल (परीक्षा) के लक्षण हैं ।

 
कुलं च शीलं च वयश्च रुपम् मुद्रण ई-मेल
कुलं च शीलं च वयश्च रुपम्
विद्यां च वित्तं च सनाथता च ।
तान् गुणान् सप्त परीक्ष्य देया
कन्या बुधैः शेषमचिन्तनीयम् ॥

कुल, शील, आयु, रुप, विद्या, द्रव्य, और पालक – ये सात बातें देखकर, अन्य किसी बात का विचार न करके बुद्धिमान मनुष्य ने अपनी कन्या देनी चाहिए ।

 
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