अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो मुद्रण ई-मेल
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥ ११ ॥

जो शास्त्रविधि से नियत यज्ञ, करना ही कर्तव्य है – इस प्रकार मन को समाधान करके – फल न चाहनेवाले पुरुषोंद्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक है ।

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