अभिसन्धाय तु फलं मुद्रण ई-मेल
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥ १२ ॥

हे भरतश्रेष्ठ - केवल दम्भाचरण के लिये अथवा फल को भी दृष्टि में रखकर जो यज्ञ किया जाता हैं, उस यज्ञ को तू राजस जान ।

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