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आजका सुविचार

Education is what survives when what has been learned has been forgotten.

शीलं शौर्यमनालस्यं पाण्डित्यं मित्रसङ्ग्रहम् ।
अचोरहरणीयानि पञ्चैतान्यक्षयो निधिः ॥

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बहुनिष्कपटद्रोही बहुधान्योपधातकः ।
रन्धान्वेषी च सर्वत्र दूषको मूषको यथा ॥

चूहे की तरह दुष्ट भी निष्कपटी लोगों का द्रोह करनेवाला (किमती वस्त्र को खा जाने वाला), ज़ादा करके दूसरेको घात करनेवाला (धान्यका नाश करनेवाला)
और छिद्र ढूँढनेवाला  (दरको ढूँढने वाला) होता है ।

 

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आकारैरिङ्गितैः गत्या चेष्टया भाषितेन च ।
नेत्र वक्त्र विकारैश्च गृह्यतेऽन्तर्गतं मनः ॥ 

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स्वायत्तमेकान्तगुणं विधात्रा विनिर्मितं छादनमज्ञतायाः ।
विशेषतः सर्वविदां समाजे विभूषणं मौनमपण्डितानाम् ॥

स्वयं के आधीन, और केवल गुणों से युक्त मौन, ब्रह्मा ने अज्ञान छीपाने के आवरणरुप हि बनाया है; खास तौर पे ज्ञानीयों की सभा में मूर्खो के लिए, मौन अलंकार रुप है ।

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तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥

मुजे भजनेवाले भक्तों में से, मुज में एकात्मभाव से भजनेवाला नित्ययुक्त ज्ञानी भक्त सब से विशेष है; क्यों कि मुज़े तत्त्व से जाननेवाले ज्ञानी भक्त को मैं अत्यंत प्रिय हूँ, और वह ज्ञानी मुज़े अत्यंत प्रिय है । 

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वरमेको गुणी पुत्रो न च मूर्खशतान्यपि ।
एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च तारागणोऽपि च ॥

सौ मूर्ख पुत्रों से तो एक गुणवान पुत्र अच्छा । अकेला चंद्र अंधकार का नाश करता है, पर ताराओं के समूह से अंधकार का नाश नहीं होता ।

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दयाङ्गना सदा सेव्या सर्वकामफलप्रदा ।
सेवितासौ करोत्याशु मानसं करुणामयम् ॥ 

सब इच्छित फल देनेवाली दयांगना का सेवन करना चाहिए । यदि सेवन किया जाय तो तुरंत हि वह मन को करुणामय बनाता है ।

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न विना परवादेन रमते दुर्जनो जनः ।
काकः सर्वरसान् भुंक्ते विनाऽमध्यं न तृप्यति ॥

लोगों की निंदा किये बिना दुर्जनों को आनंद नहीं आता ।  कौए को सब रस भुगतने के बावजुद गंदगी बिना  तृप्ति नहीं होती ।

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पंकैर्विना सरो भाति सभा खलजनै र्विना।
कटुवणैर्विना काव्यं मानसं विषयैर्विना ॥

सरोवर कीचडरहित हो तो शोभा देता है, दुष्ट मानव न हो तो सभा, कटु वर्ण न हो तो काव्य और विषय न हो तो मन शोभा देता है ।

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कुभोजने दिनं नष्टं कुनार्या यौवनं हतम्
कुपुत्रेण कुलं नष्टं धनं नष्टं न दीयते ॥ 

कुभोजन से दिन बिगडता है; कुनारी से यौवन खत्म होता है; कुपुत्र से कुल नष्ट होता है; और न देने से धन-नाश होता है ।

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विश्व को क्या देंगे ? केवल हिंदुत्त्व ? छापें ई-मेल
चिंतन - धर्म-तत्त्व
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वैदिकधर्म विचार (भा. १)

मार्च का समय था । दसवीं कक्षा के इम्तेहान सर पे आ रहे थे । सतीश उसके मित्रों के साथ बडे इत्मनान से उसकी तैयारीयों में लगा हुआ था । एकाएक शहर का व्यवहार ध्वस्त हो गया । किसी कट्टर मजहबी नेता की धरपकड से दंगे फसाद सुरु हो गये थे । बच्चों का घर से आना-जाना सुरक्षित नहीं था । दोस्तों का मिलना बंद हुआ, साथ में होनेवाली पढाई भी रुक गई ।

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वैदिक संपदा, विश्व संपदा छापें ई-मेल
चिंतन - धर्म-तत्त्व

Image वैदिकधर्म विचार (भा. २)

आज शनिचर है । कॉलेज में अंतिम दो लेक्चर्स कॅन्सल हुए, तो प्रतीक मिहिर को अपने घर खाने पर ले गया । घर पहुँचकर दोनों ने रसोई में हाथ बँटाया, क्यों कि मिहिर के आने से माँ को अपना रसोई कार्यक्रम बदलना पडा था । दोनों ने मिलकर खीर पकायी और फिर खाना खाकर दिवानघर में बातें करने बैठ गये । 
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आर्यावर्त: यथा विचार तथा आचार छापें ई-मेल
चिंतन - धर्म-तत्त्व

Image वैदिकधर्म विचार (भा. 3)

अचिनोति च शास्त्रार्थं आचारे स्थापयत्यति ।
स्वयमप्याचरेदस्तु स आचार्यः इति स्मृतः ॥
 

जो स्वयं सभी शास्त्रों का अर्थ जानता है, दूसरों के द्वारा ऐसा आचार स्थापित हो इसलिए अहर्निश प्रयत्न करता है; और ऐसा आचार स्वयं अपने आचरण में लाता है, उन्हें आचार्य कहते है ।

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अंतःकरण शुद्धि और चारित्र्य निर्माण छापें ई-मेल
चिंतन - दार्शनिक चिंतन

Image भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण परिणाम है - उच्च चारित्र्य का निर्माण नचिकेता, राजा जनक, महर्षि वेदव्यास, श्रीमद् आद्य शंकराचार्य, संत ज्ञानेश्वर, छत्रपति शिवाजी, लोकमान्य तिळक, स्वामी विवेकानन्द जैसे अनेक चरित्र इस भव्य संस्कृति की अमूल्य देन है भारतीय इतिहास के हर काल हर क्षेत्र में ऐसे उच्च चरित्र का होना हमारी संस्कृति की गरिमा तथा यशस्वीता का प्रतीक है । 

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विश्व या अजूबा ! छापें ई-मेल
चिंतन - आधुनिक विज्ञान

Image “It is a terrible thing to see and have no vision”. हेलन कॅलर के इन शब्दों में चर्म चक्षु की मर्यादा व्यक्त होती है । क्या मतलब यदि आँखें हो पर दृष्टि न हो ! दृष्टि हो पर दर्शन (दृष्टिकोण और ध्येय) न हो !

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