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आजका सुविचार

There are souls in this world which have the gift of finding joy everywhere and of leaving it behind them when they go.

अभ्यासेन क्रियाः सर्वाः अभ्यासात् सकलाः कलाः ।
अभ्यासात् ध्यानमौनादिः किमभ्यासस्य दुष्करम् ॥

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को न याति वशं लोके मुखे पिण्डेन पूरितः ।
मृदङ्गो मुखलेपेन करोति मधुरध्वनिम् ॥ 

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अपि प्रसन्नेन महर्षिणां त्वं सम्यग्विनीयानुमतो गृहाय ।
कालो ह्ययं संक्रमितुं द्वितीयं सर्वोपाकारक्षममाश्रमं ते ॥

तुमसे प्रसन्न होकर क्या महर्षि वरतंतु ने तुम्हें अच्छी तरह शिक्षा देकर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के लिए अनुज्ञा दी है ? कारण सभी आश्रमों में उपकारक्षम तो गृहस्थाश्रम है, उस में प्रवेश करने का यही समय है । (रघुराजा की कौत्स को उक्ति)

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दानेन प्राप्यते स्वर्गो दानेन सुखमश्नुते ।
इहामुत्र च दानेन पूज्यो भवति मानवः ॥

दान से स्वर्ग प्राप्त होता है, दान से ही सुख मिलता है । इस लोक और परलोक में इन्सान दान से ही पूज्य बनता है ।

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सप्तैतानि न पूर्यन्ते पूर्यमाणान्यनेकशः ।
ब्राह्मणोऽग्निर्यमो राजा पयोधिरुदरं गृहम् ॥

ब्राह्मण, अग्नि, यमराज, राजा, सागर, पेट और घर -  ये सात, अनेक बार पूर्ण करने पर भी कभी पूर्ण नहीं होते ।

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यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥

जो आहार आधा कच्चा-पक्का, सूख गये रसवाला, स्वभाव से दुर्गंधी, बासी और जूठा हो, तथा जो अपिवत्र हो, वैसा आहार तामसी इन्सान को प्रिय होता है ।
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एकमेव व्रतं श्लाध्यं ब्रह्मचर्यं जगत्त्रये ।
यद्विशुद्धिं समापन्नाः पूज्यन्ते पूजितैरपि ॥ 

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नित्यमाचरतः शौचं कुर्वतः पितृतर्पणम् ।
यस्य नोद्विजते चेतः शास्त्रं तस्य करोति किम् ॥

सदैव शौच विधि का आचरण और पितृतर्पण करने के बावजुद, जिसे वैराग्य खडा नहीं होता, शास्त्र उनका क्या करेगा ?

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संसारविषवृक्षस्य द्वे फले ह्यमृतोपमे ।
काव्यामृतरसास्वादः सङ्गतिः सज्जनैः सह ॥

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यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः ।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥

जो कर्म बहुत परिश्रम उठाकर किया जाता है, और उपर से भोगेच्छा से या अहंकार से किया जाता है, वह कर्म राजसी कहा गया है ।

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विश्व को क्या देंगे ? केवल हिंदुत्त्व ? छापें ई-मेल
चिंतन - धर्म-तत्त्व
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वैदिकधर्म विचार (भा. १)

मार्च का समय था । दसवीं कक्षा के इम्तेहान सर पे आ रहे थे । सतीश उसके मित्रों के साथ बडे इत्मनान से उसकी तैयारीयों में लगा हुआ था । एकाएक शहर का व्यवहार ध्वस्त हो गया । किसी कट्टर मजहबी नेता की धरपकड से दंगे फसाद सुरु हो गये थे । बच्चों का घर से आना-जाना सुरक्षित नहीं था । दोस्तों का मिलना बंद हुआ, साथ में होनेवाली पढाई भी रुक गई ।

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वैदिक संपदा, विश्व संपदा छापें ई-मेल
चिंतन - धर्म-तत्त्व

Image वैदिकधर्म विचार (भा. २)

आज शनिचर है । कॉलेज में अंतिम दो लेक्चर्स कॅन्सल हुए, तो प्रतीक मिहिर को अपने घर खाने पर ले गया । घर पहुँचकर दोनों ने रसोई में हाथ बँटाया, क्यों कि मिहिर के आने से माँ को अपना रसोई कार्यक्रम बदलना पडा था । दोनों ने मिलकर खीर पकायी और फिर खाना खाकर दिवानघर में बातें करने बैठ गये । 
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आर्यावर्त: यथा विचार तथा आचार छापें ई-मेल
चिंतन - धर्म-तत्त्व

Image वैदिकधर्म विचार (भा. 3)

अचिनोति च शास्त्रार्थं आचारे स्थापयत्यति ।
स्वयमप्याचरेदस्तु स आचार्यः इति स्मृतः ॥
 

जो स्वयं सभी शास्त्रों का अर्थ जानता है, दूसरों के द्वारा ऐसा आचार स्थापित हो इसलिए अहर्निश प्रयत्न करता है; और ऐसा आचार स्वयं अपने आचरण में लाता है, उन्हें आचार्य कहते है ।

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अंतःकरण शुद्धि और चारित्र्य निर्माण छापें ई-मेल
चिंतन - दार्शनिक चिंतन

Image भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण परिणाम है - उच्च चारित्र्य का निर्माण नचिकेता, राजा जनक, महर्षि वेदव्यास, श्रीमद् आद्य शंकराचार्य, संत ज्ञानेश्वर, छत्रपति शिवाजी, लोकमान्य तिळक, स्वामी विवेकानन्द जैसे अनेक चरित्र इस भव्य संस्कृति की अमूल्य देन है भारतीय इतिहास के हर काल हर क्षेत्र में ऐसे उच्च चरित्र का होना हमारी संस्कृति की गरिमा तथा यशस्वीता का प्रतीक है । 

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विश्व या अजूबा ! छापें ई-मेल
चिंतन - आधुनिक विज्ञान

Image “It is a terrible thing to see and have no vision”. हेलन कॅलर के इन शब्दों में चर्म चक्षु की मर्यादा व्यक्त होती है । क्या मतलब यदि आँखें हो पर दृष्टि न हो ! दृष्टि हो पर दर्शन (दृष्टिकोण और ध्येय) न हो !

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